क्या चाहती है हम से, हमारी ये ज़िंदगी....क्या क़र्ज़ है जो हम से, अदा हो नहीं रहा....
क्या चाहती है हम से, हमारी ये ज़िंदगी....
क्या क़र्ज़ है जो हम से, अदा हो नहीं रहा....
हमें चाँद जैसा चहेरा देखने की इज़ाज़त देदो,
हमें एक प्यारी सी शाम सजाने की इज़ाज़त देदो.
हमें कैद करलो आपकी मोहब्बत की जाल में,
या हमें आपको मोहब्बत करने की इज़ाज़त देदो
यूँ बिछड़ना भी बहुत आसाँ न था उस से मगर
जाते जाते उस का वो मुड़ कर दोबारा देखना
समझदार बनने की कोशिश में शरारत
भी खो बैठे
अब इस समझदारी में सबको साजिश नजर
आती है…