बहते अश्कों की जुबाँ नहीं होती,
कभी लफ्जों में मोहब्बत बयाँ नहीं होती,
मिले जो प्यार तो कदर करना,
क्योंकि किस्मत हर किसी पर मेहरबान नहीं होती.
हमें चाँद जैसा चहेरा देखने की इज़ाज़त देदो,
हमें एक प्यारी सी शाम सजाने की इज़ाज़त देदो.
हमें कैद करलो आपकी मोहब्बत की जाल में,
या हमें आपको मोहब्बत करने की इज़ाज़त देदो
कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बे-हिसाब आए
यूँ बिछड़ना भी बहुत आसाँ न था उस से मगर
जाते जाते उस का वो मुड़ कर दोबारा देखना
समझदार बनने की कोशिश में शरारत
भी खो बैठे
अब इस समझदारी में सबको साजिश नजर
आती है…