जहाँ कमरे में कैद हो जाती है ज़िन्दगी,लोग उसको बड़ा शहर कहते हैं ।
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलेंजिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
अजीब जुल्म करती हैं तेरी यादें मुझ परसो जाऊं तो उठा देती हैं जाग जाऊँ तो रुला देती है
"ना वो मेरी जिम्मेदारी है,ना वो मेरी मज़बूरी है,साथी है राहों की मेरी,ज़िंदगी में मेरी जरुरी है l"
बहुत छोटी List है, मेरी ख्वाइशों की,
पहली भी तुम और आखरी भी तुम.
आँखों की गहराई को समझ नहीं सकते,
होठों से हम कुछ कह नहीं सकते,
कैसे बयाँ करे हम आपको ये दिल-ए-हाल,
की तुम ही हो जिसके बैगेर हम रह नहीं सकते.