सुन पगली
अकेले हम ही शामिल नहीं है इश्क की जुर्म में
जब नज़रे मिली थी तो तू भी मुस्कुराई थी
इक डूबती धड़कन की सदा लोग ना सुन ले…
कुछ देर को बजने दो ये शहनाई ज़रा और…
कांटे किसी के हक में किसी को गुलो-समर,
क्या खूब एहतमाम-ए-गुलिस्ताँ है आजकल।
लफ्ज़ो को तो दुनिया समझती हैकाश कोई ख़ामोशी भी समझता।
जी है बड़ी बादशाहत से जिंदगी,उम्मीद है आगे भी रहेगी कायम lकुछ पल का जलजला है,आगे तो फिर है सुकून बिन कोई गम l
सुबह को सताना अच्छा लगता है,
सोये हुए को जगाना अच्छा लगता है,
जब याद आती है किसी की तो,
उसे भी अपनी याद दिलाना अच्छा लगता है..!