सुन पगली
अकेले हम ही शामिल नहीं है इश्क की जुर्म में
जब नज़रे मिली थी तो तू भी मुस्कुराई थी
उनकी पलकों से शुरू हुयी दास्तान-ए-मुहब्बत,
जिनका झुकना भी क़यामत, जिनका उठना ही क़यामत. .!!
लफ्ज़ो को तो दुनिया समझती हैकाश कोई ख़ामोशी भी समझता।
पूरी रात जाग वो मेरा बाहर इंतजार कर रही थी ,पगली ! मैं तेरे भीतर बैठा तेरा राह ताक रहा था l
जी है बड़ी बादशाहत से जिंदगी,उम्मीद है आगे भी रहेगी कायम lकुछ पल का जलजला है,आगे तो फिर है सुकून बिन कोई गम l
सुबह को सताना अच्छा लगता है,
सोये हुए को जगाना अच्छा लगता है,
जब याद आती है किसी की तो,
उसे भी अपनी याद दिलाना अच्छा लगता है..!