बे-ख़्वाबी कब छुप सकती है काजल से भी,
जागने वाली आँख में लाली रह जाती है!
आधे तेरी याद के, आधे फरियाद के,
लम्हे जितने गुज़रे सारे बर्बाद थे…
अंदाज़ भी निराला है उनका
वो हो कर खफा मुझ से
मेरे गुमशुदगी की वजह पूछते हैं
मोहब्बत में यारों हमनें क्या-क्या नहीं लूटाया…
उन्हें पसंद थी रोशनी हमनें खुद को जला दिया…
वो रोज़ देखता है डूबते सूरज को इस तरह,काश... मैं भी किसी शाम का मंज़र होता।
"जितना जानता है वो,उससे जादा प्यार करती है lजितना दिखाता है वो,उससे जादा प्यार करता है l"