कल जो मिली थी खुशबु-ऐ-इत्र,उसकी बात तो बता रहा हूँ lऔर जो महका गया,वो कोना-कोना रूह तक lवो एहसास जिए जा रहा हूँ l
छीन ले मुझसे मेरा सब कुछ,मेरे अंदर का जहां रहने देना,तेरे महलो की ख्वाहिश नहीं,अंधेरा टूटा मकान रहने देना l
"उसे पाने की कोशिश में, खुद को खो चुका हूँ,कई बार टूटे है सपने, मैं कई बार रो चुका हूँ l"
सूरज रज़ाई ओढ़ के सोया तमाम रात
सर्दी से इक परिंदा दरीचे में मर गया
वफ़ा तुझ से ऐ बेवफ़ा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
ना छेड किस्सा-ए-उल्फत, बडी लम्बी कहानी है,
मैं ज़माने से नहीं हारा, किसी की बात मानी है,,,,,,।।