उस मोड़ से शुरू करनी है फिर से जिंदगी
जहा सारा शहर अपना था और तुम अजनबी
खुश हूँ कि मुझको जला के तुम हँसे तो सही,
मेरे न सही… किसी के दिल में बसे तो सही।
यूं तो तेरी महफिल में हमे चाहने वालो की कमी नहीं,पर हम तुझे चाहने में कोई खता करें ये भी तो हमें गवारा नही।
ये ना पूछ कितनी शिकायतें हैं तुझसे ऐ ज़िन्दगी,
सिर्फ इतना बता की तेरा कोई और सितम बाक़ी तो नहीं।
कभी-कभी यूं ही चले आया करो दिल की दहलीज पर,,,,अच्छा लगता है, यूँ तन्हाइयों में तुम्हारा दस्तक देना...!!!