आलम तो ये न था कि दूरियाँ इतनी बढ़ जाये,
पर बेक़रारी ने तो हद कर दी।
करने वाले डरा नहीं करते,
डरने वाले करा नहीं करते .
जो करते है डर पे काबू,
उनका दिमाग कभी ना हो बेकाबू .
उसकी पलकों से आँसू को चुरा रहे थे हम…
उसके गमों को हंसी से सजा रहे थे हम…
फिर जलाया उसी दीये ने मेरा हाथ…
जिसकी लौ को हवा से बचाये जा रहे थे हम…
जी चाहे कि दुनिया की हर एक फ़िक्र भुला कर,दिल की बातें सुनाऊं तुझे मैं पास बिठाकर।
कौन सी लत ये मुझे सोचने की लग गई हैफ़ैसले कितने हुआ करते थे आसान मेरे
"आँखे खोलने से पहले,
तुम्हें याद कर लेता हूँ,
हर सुबह कल रात सा,
थोड़ा प्यार कर लेता हूँ l"