चलो ये जुर्म भी कबूल है,
जो तेरी इजाज़त के बगैर तुझे अपना समझा.
उस राह पर मुझको जाना है…
जिस राह पर मुझको श्याम मिले…
कुछ मिले या ना मिले बस…
उनकी सेवा का मुझे काम मिले…
उसकी आँखें सवाल करती हैंमेरी हिम्मत जवाब देती है
उसकी आँखें सवाल करती हैं
मेरी हिम्मत जवाब देती है
"ना खुश होता हूँ, ना उदास होता हूँ,तुम नहीं होती, पर तेरे पास होता हूँ,पागलों सा भागता हूँ,तलाश में खुद के,बताता नहीं हूँ पर, इंतज़ार में होता हूँ l"
हक़ से अगर दे दो,
नफरत भी कबूल है हमे,
खैरात में तो हम…
तुम्हारी महोब्बत भी न ले.
जिन फूलों को संवारा था
हमने अपनी मोहब्बत से,
हुए खुशबू के काबिल तो
बस गैरों के लिए महके।