नन्हें हाथ ब्रश पकड़,कोई तस्वीर नहीं बनाते,एक ख़्वाब जो शब्दों सेबयां ना कर सके वो,रंगों से सजाते है l
"बड़ी तेजी से इंसान -इंसान को भूल रहा था,
ये ठोकर भी जरुरी था,थोड़ा ब्रेक लगाने को l"
तुम भी बदल गये,
हम भी बदल गये,
तब जाके ये ज़माना बदला..
रविवार का दिन,
सुबह का मौसम,
एक प्याली चाय,
तुम्हारा ख्याल,
जब तुम साथ होती हो..
बस इतना ही अच्छा लगता है l❤❤
खवाब कहाँ नज़र कहाँ
ज़िंदगी कहाँ बसर कहाँ
हुआ सवेरा तो हम उनके नाम तक भूल गए
जो बुझ गए रात में चरागों की लौ बढ़ाते हुए।