लफ्जों के बोझ से
थक जाती है जुबाँ
कभी कभी
पता खामोशी
"मज़बूरी" है या
"समझदारी"
शब्दों का भी
तापमान होता है,
ये सुकून भी देते है
और जला भी
देते है...
आज लाखो रुपये बेकार हैवो एक रुपये के सामनेजो माँ स्कूल जाते वक्त देती थी
वक्त के साथ सब बदल जाता है,
पुराने जमाने में जिसे ठेंगा कहते थे,
उसे आज लाईक कहते हैं!
जो कट गई,
वो तो उम्र थी साहब.....!
जिसे जी लिया,
उसे जिंदगी कहिये......!!