काग़ज के फूल भी महकते हैं,
कोई देता है, जब मोहब्बत से!
जुल्फों में उसकी बीती मेरी सुबह
जुल्फों में ही उसकी मेरी शाम थी
और क्या बताऊ जिंदगी के बारे में
मेरी तो सारी उम्र बस उस ही के नाम थी…
है पेट की आग कुछ ऐसी ,दो रोटी से कहाँ बुझा पाता हूँ lघुमता हूँ दर-दर कुछ इस तरहअपने घर पर मेहमान हो जाता हूँ l
" दो ही नशा है जो मैं करता नहीं,और बिन किये भी मैं रहता नहीं,एक चाय और एक तुम.. "
क्या तुम समझ जाओगी,क्या मैं समझा पाउँगा lइसी द्वन्द में जब रहता हूँ,कहते कहते भी,तभी चुप रहता हूँ l
छीन ले मुझसे मेरा सब कुछ,मेरे अंदर का जहां रहने देना,तेरे महलो की ख्वाहिश नहीं,अंधेरा टूटा मकान रहने देना l