खुदा करे वो मोहब्बत जो तेरे नाम से है,हजार साल गुजरने पे भी जवान ही रहे।
रूठे तो इक लफ्ज़ नहीं कहती है मुंह सेबस खाने में नमक ज़्यादा कर देती है..
ये बैचनी जो मेरे घर आई है,ना जाने कौनसा दर्द साथ लाई है lक्यों नज़र को, नज़र की तालाश है,क्या ये काँटों से भरा गुलाब है,या दूर कुसुमित फूल पलाश है l
नज़र से दूर हुआ, दिल से नहीं,इश्क़ तुझसे पछताना तो यही सही lदूर तुझसे रहना मुझे भी नहीं भाता,ये बात तेरे सामने बताना नहीं आता l
Izhar-e-Tamanna Hi Tauheen-e-Tamanna Hai,
Tum Khud Hi Samajh Jaao Main Naam Nahi Lunga.
Jis ke naseeb mein hon zamaney ki thokarein…!!
Us bad-naseeb sey na sahar’on ki baat ker…