सुन पगली
अकेले हम ही शामिल नहीं है इश्क की जुर्म में
जब नज़रे मिली थी तो तू भी मुस्कुराई थी
इक डूबती धड़कन की सदा लोग ना सुन ले…
कुछ देर को बजने दो ये शहनाई ज़रा और…
होठ तो खामोश रहेंगे वादा है मेरा आपसे।
निगाहें अगर कुछ कह बैठे तो,
खफा मत हो जाना।
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तड़प रहे है हम तुमसे एक अल्फाज के लिए,तोड़ दो खामोशी हमें जिन्दा रखने के लिए।
एक अकेले से ये रस्म अदा नहीं होती…शुरुआत ही ‘दो’स्ती की ‘दो’ से होती है!
पहली मोहब्बत थी और हम दोनों ही बेबस,वो ज़ुल्फ़ें सँभालते रहे और मैं खुद को।