आलम तो ये न था कि दूरियाँ इतनी बढ़ जाये,
पर बेक़रारी ने तो हद कर दी।
बड़ी दूर तक जाने का इरादा है,यही एक छोटा सा वादा है lमेरे गमो को चुम लेती है वो ,उसकी खुशी हो जाने का इरादा है l
उसकी पलकों से आँसू को चुरा रहे थे हम…
उसके गमों को हंसी से सजा रहे थे हम…
फिर जलाया उसी दीये ने मेरा हाथ…
जिसकी लौ को हवा से बचाये जा रहे थे हम…
जी चाहे कि दुनिया की हर एक फ़िक्र भुला कर,दिल की बातें सुनाऊं तुझे मैं पास बिठाकर।
किसी ने खत में लिखा है "ताबिश"यहाँ कुछ दिन से बारिश हो रही है ।
कौन सी लत ये मुझे सोचने की लग गई हैफ़ैसले कितने हुआ करते थे आसान मेरे