ये गरजते बादल,ये बिन मौसम की बारिश, लगता है
अब जनवरी को भी दर्द हो रहा है दिसम्बर के जाने का
तेरी तरफ चले तो उम्र कट गई,ये और बात है रास्ता काटता नहीं।
जो रोज दिल को दे सुकून,वो प्यार है lमिले सोने को और मोहलत,तो रविवार है l
मेरी चिल्लाने की आवाज़ मैं खुद नही सुन पाया,नज़र में ये था की नाटक ना समझ ले l
हर किसी के नसीब मेँ कहाँ लिखी है चाहतेँ,
कुछ लोग दुनिया मेँ आते है फ़कत तन्हाइयों के लिये॥
तूने रुख से नक़ाब क्या उठाया,
कम्बखत दिल मुँह को होने लगा,
शर्मा कर , सितारे हैं छुपने लगे,
महताब बादलों से जो निकलने लगा