दोस्त की ख़ामोशी को मैं समझ नहीं पाया,चेहरे पर मुस्कान रखी और अकेले में आंसू बहाया।
"रो देती है हर बार जब आँगन से जुदा होती है,बेटियांँ एक बार नहीं कई बार विदा होती है।।"
मेरी चिल्लाने की आवाज़ मैं खुद नही सुन पाया,नज़र में ये था की नाटक ना समझ ले l
तुम्हें अपने आँगन के पेड़ की,याद नहीं आती..खिड़की पे जो मिलती थी नज़र,वो एहसास आँखों में नहीं आती l
खोज के बाहर तुमको,
हार गया हूँ मैं,
झाँका जब मन भीतर,
वंही बैठी थी तुम l
Pyar Bhari shayari