चलो ये जुर्म भी कबूल है,
जो तेरी इजाज़त के बगैर तुझे अपना समझा.
उस राह पर मुझको जाना है…
जिस राह पर मुझको श्याम मिले…
कुछ मिले या ना मिले बस…
उनकी सेवा का मुझे काम मिले…
रिहा कर ख़ूबसूरत दिखने की चाहत से मुझे..ऐ आईने तू मेरी सादगी को ज़मानत दे दे
रिहा कर ख़ूबसूरत दिखने की चाहत से मुझे..
ऐ आईने तू मेरी सादगी को ज़मानत दे दे
कुछ बातें इतनी गंभीर होती है,कि वो केवल मजाक में ही कि जा सकती है
"ना खुश होता हूँ, ना उदास होता हूँ,तुम नहीं होती, पर तेरे पास होता हूँ,पागलों सा भागता हूँ,तलाश में खुद के,बताता नहीं हूँ पर, इंतज़ार में होता हूँ l"
आरज़ू होनी चाहिए किसी को याद करने की……!!
लम्हें तो अपने आप ही मिल जाते हैं….!!