उनके सुर्ख लब और वफा की कसम,
हाय क्या कसम थी खुदा की कसम!
सुरमई शाम का काजल लगा के रात आई है,
पलकें यूँ झुकीं हैं मानों चाँद पर बदरी छाई है!
तेरी खामोशी, अगर तेरी मजबूरी है,तो रहने दे इश्क कौन सा जरूरी है.
है पेट की आग कुछ ऐसी ,दो रोटी से कहाँ बुझा पाता हूँ lघुमता हूँ दर-दर कुछ इस तरहअपने घर पर मेहमान हो जाता हूँ l
उठाये जो हाथ उन्हें मांगने के लिए,
किस्मत ने कहा, अपनी औकात में रहो।