“क्यूँ नहीं महसूस होती उसे मेरी तकलीफ,
जो कहते थे बहुत अच्छे से जानते है तुझे।”
अपना बादल तलाशने के लिए
उमर भर धूप में नहाए हम
ये गरजते बादल,ये बिन मौसम की बारिश, लगता है
अब जनवरी को भी दर्द हो रहा है दिसम्बर के जाने का
उसने सही कहा था मैं आदत हूँ उसकी,
और आदतों का बदल जाना कोई बड़ी बात तो नहीं.
उसी का शहर, वही मुद्दई, वही मुंसिफ
हमीं यकीन था, हमारा कुसूर निकलेगा
यकीन न आये तो एक बार पूछ कर देखो
जो हंस रहा है वोह ज़ख्मों से चूर निकलेगा