पहली मोहब्बत थी और हम दोनों ही बेबस,वो ज़ुल्फ़ें सँभालते रहे और मैं खुद को।
"अपने दिल से,एक झूठ रोज बोल देता हूँ,मोह्हबत नहीं है तुमसे, ये सोच लेता हूँ,डर है राज खुलते, तुम ख़फ़ा ना हो जाओ,जितनी हो बहुत हो, ये किस्मत मान लेता हूँ l
"कितने बंधनों में बँधी है, तुमसे ये मोह्हबत मेरी,याद कर सकते है, पर खबर नहीं ले सकते तेरी l"
चार दीवारों के अलावा भी,घर में कुछ होता है,दो बाहें होती है औरएक दिल होता है...
इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के
होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है