ङरे क्यूं मेरा कातिलक्या रहेगा उसकी गर्दन पर वो खून,जो चश्म-ए-तर से उर्म भर यूॅ दम-ब-दम निकले
ङरे क्यूं मेरा कातिल
क्या रहेगा उसकी गर्दन पर वो खून,
जो चश्म-ए-तर से उर्म भर यूॅ दम-ब-दम निकले
शांत मन समंदर कभी बहक जाता है,कुछ बूँद आँखों से छलक जाता है lबर्फ के पिघलने से सैलाब नहीं आती,आँसू से पत्थर भी पिघल जाता है l
वो नदी की मीठी पानी,उस जैसा कोई अनमोल नहीं,समंदर में बहुत है पानी,पर वो उसका कोई मोल नहीं l
बन के रूह तेरे जिस्म मे उतार जाऊं तो अच्छा है,
किसी रात तेरी गोद में सर रख कर सो जाऊं,
उस रात की कभी सुबह ना हो तो अच्छा है
दिल-ए-आबाद का बर्बाद भी होना ज़रूरी है
जिसे पाना ज़रूरी है उसे खोना ज़रूरी है