ये कैसा सरूर है तेरे इश्क का मेरे मेहरबाँ,
सँवर कर भी रहते हैं बिखरे बिखरे से हम!
कश्ती है, पुरानी मगर दरिया बदल गया।
मेरी तलाश का भी जरिया बदल गया।
ना शक्ल बदली, ना ही बदला मेरा किरदार,
बस लोगों को देखने का नजरिया बदल गया।
दोस्तों रात्री का समय सबसे अच्छा समय होता है हम सभी के लिए क्यूंकि दिन भर की दौड़ धुप के बाद एक रात्रि का ही वक़्त होता है जब हम शांति से बैठते है और सभी दिक्कतों परेशानियों को भूल कर एक सुन्दर और नई सुबह का इंतज़ार में सो जाते हैं.
“तारीख हज़ार साल में बस इतनी सी बदली है,…
तब दौर पत्थर का था अब लोग पत्थर के हैं”….
शिकवा भी होगा हमसे शिकायत भी होगी,
पर दोस्त से गिला किया नहीं करते।
हम अच्छे नहीं बुरे ही सही,
तुम्हें वैलेंटाइन मुबारक हो,
लेकिन हम जैसा दोस्त मिला नहीं करते।।