अब ये न पूछना के मैं अलफ़ाज़ कहाँ से लाता हूँ,कुछ चुराता हूँ दर्द दूसरों के कुछ अपनी सुनाता हूँ।
अब ये न पूछना के मैं अलफ़ाज़ कहाँ से लाता हूँ,
कुछ चुराता हूँ दर्द दूसरों के कुछ अपनी सुनाता हूँ।
हाल तेरा हर वक़्त पूछ नहीं पाता,ये ना समझना की याद नहीं आता lहर पहर कुछ नहीं बदलता,ये आदत है मेरी, इस पर बस मेरा नहीं चलता
ख़फ़ा हो, गुस्सा हो और नाराज़ भी होचलो ! कोई बात नहीं,गलती मेरी है मना लूँगा lचली भी गई ग़र जो मुझे छोड़कर,ये वादा है बेवफा का इल्ज़ाम ना दूँगा l
कल छोड़ आऊं पीछे,आज नए सवेरे की बात होगी lपूरा दिन तो मेरा है,क्या हुआ जो फिर रात होगी l
न सोचा मैंने आगे,
क्या होगा मेरा हशर,
तुझसे बिछड़ने का था,
मातम जैसा मंज़र!