कोरा कागज़ था और कुछ बिखरे हुए लफ़्ज़,
ज़िक्र तेरा आया तो सारा कागज़ गुलाबी हो गया
चलो ये जुर्म भी कबूल है,
जो तेरी इजाज़त के बगैर तुझे अपना समझा.
"मेरे बस में होता तो, एक पल भी तुमसे दूर ना होता,तुम्हारी बाहों में गुजरती रात, फिर कभी दिन ना होता l"
उमीद तो हमने ये की थी,
में राँझा तेरा तू मेरी हीर बने,
पर शायद खुद को ये मंज़ूर न था,
की तू मेरी तकदीर बने!
सूरज नहीं डूबा ज़रा सी शाम होने दो”
मैं खुद लौट जाउंगा मुझे नाकाम होने दो”
मुझे बदनाम करने का बहाना ढूँढ़ते हो क्यों
मैं खुद हो जाऊंगा बदनाम पहले नाम होने
दो..
तैरना तो आता था हमें मुहब्बत के समंदर में
लेकिन जब उसने हाथ ही ना पकड़ा तो डूब जाना ही अच्छा था