ऐ हवा तू ये जुर्म ना करा कर,
तू उसे यूँ छूआ ना कर….
कांटे किसी के हक में किसी को गुलो-समर,
क्या खूब एहतमाम-ए-गुलिस्ताँ है आजकल।
बुरे कर्म करने नहीं पड़ते हो जाते है,
और अच्छे कर्म होते नहीं करने पड़ते हैं।
उनकी पलकों से शुरू हुयी दास्तान-ए-मुहब्बत,
जिनका झुकना भी क़यामत, जिनका उठना ही क़यामत. .!!
कल बुरा था,तो कल भी हो..जरुरी तो नहीं,दो रातों के बीच तो,हमेशा उजाला होता है l
इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के