बड़ी मासूम सी लगती है,ये कार्तिक की भोर lलगता है ओढे आई एक चादर,मन लगता नाचे जैसे मोर l
तमाम हसरतों को आराम देकर,फिर बैठे हैं किसी कोने में चाय लेकर।
घर में रह कर बिना काम के "मम्मी मम्मी"
चिल्लाने में भी एक अलग सुकून है...
बिना दोस्त बने,
कोई अच्छा प्रेमी
नहीं हो सकता,
कभी देखा है तुमने,
रेत में गुलाब,
खिलते हुए l
"हर झूठ मेरे मन से, ख़त्म होते जा रहे है,वो जाने कैसे मेरे सच के, करीब आ रहे है l"