बड़ी मासूम सी लगती है,ये कार्तिक की भोर lलगता है ओढे आई एक चादर,मन लगता नाचे जैसे मोर l
तमाम हसरतों को आराम देकर,फिर बैठे हैं किसी कोने में चाय लेकर।
साथ रहने की क़ीमत,क्या चुकाता,बे-मोल को कैसे,मिलता कोई अनमोल...
तेरी यादों में सुकून बहुत है,बीते लम्हों में प्यार बहुत है lबस यादशहर ऐसे ही बसा रहें,इस शहर में वो खास बहुत है l
"हर झूठ मेरे मन से, ख़त्म होते जा रहे है,वो जाने कैसे मेरे सच के, करीब आ रहे है l"