Samjhauta Ek Story, समझौता

Samjhauta Ek Story

दिसंबर की सर्द रात थी, हर तरफ दूर दूर तक ओस और कोहरे की परत पूरे क़स्बे पर छाई हुई थी.

 रात के करीब 12 बज रहे थे, कविता अचानक चौंक कर जाग गई. उसकी साँसे तेज़ हो गई थी , ऐसा लग रहा था कि उसने कोई बुरा सपना देखा हो, उसने पास की टेबल लैंप जला दी. कमरे में उजाला फ़ैल गया मानों छत के किसी झरोखे से चाँद कमरे में झाँक रहा हो. कविता पसीने में पूरी डूबी हुई थी, उसने पास के गिलास से पानी पिया और बेड से उठकर बाहर बालकनी में आ गई. 

एक अलग सी बेचैनी उसे घेरे हुए थी. बालकनी में रखे चेयर पर ओस की बूँद बिखरी हुई थी, उसने हाथ की हथेली से ओस की बूंदों को पोंछा और उस चेयर पर बैठ गई. एक दम शांति पसरी हुई थी, चारों तरफ एकदम सन्नाटा था, ऐसा लग रहा था कि वही एक इंसान इस पूरे इलाके में ज़िंदा थी. ठंडी हवाओं का शोर था, दूर पार्क में लगे पेड़ पर एक उल्लू बैठा अपनी शिकारी आँखों से एक टक देख रहा था. कुछ देर तक कविता वही बैठी रही, वो बार अपने उस अजीबोगरीब सपने के बारे में सोच रही थी. मानों वो किसी से लड़ रही हो, या फिर कोई उसे मार रहा हो और वो उसका विरोध कर रही हो. हम अपने अतीत से कुछ पल के लिए इधर उधर जा जरूर सकते हैं लेकिन उससे कभी बच नहीं सकते. रह रहकर उस अतीत की छाप हमें स्पष्ट दिखाई देती हैं. कविता के साथ भी यही हो रहा था. दरअसल वो कोई ख़्वाब नहीं बल्कि हक़ीक़त था, उसकी आप बीती थी. अपने पति का घर छोड़े उसे 3 साल बीत चुके थे लेकिन इन बीते तीन सालों में उसके जीवन में वही पुरानी दुःख भरी यादें रह रहकर उसे अचानक याद आ जाया करते थे. 

लड़कियों को हमेशा से ही समझौता सिखाया जाता हैं, कभी अपने ख़्वाबों से, कभी अपने पढ़ाई करने की इच्छा से तो कभी अपने मन की चाहतों से. ऐसा ही कुछ कविता के साथ भी हुआ था. जब उसके न चाहते हुए भी उसकी शादी एक ऐसे इंसान से करा दी गयी थी जिसे उसका परिवार कुछ महीनों पहले ही मिला था. उस समय भी वो अपने परिवार से कहना चाहती थी कि वो अभी शादी नहीं करेगी, अभी उसे पढ़ना हैं, प्रोफेसर बनना हैं. लेकिन उसे मौका ही नहीं दिया गया और उसे एक बार फिर से समझौता करना पड़ा. पर वो कहाँ जानती थी कि इस बार उसके इस समझौते का अंजाम इतना बुरा होगा. हर्ष जिसे उसके परिवार ने उसके लिए चुना था वो इतना बुरा होगा. इस बात को तीन साल बीत गए थे आज तीन साल पहले अपने रोज रोज के झगड़ों और घुटन भरी उस ज़िंदगी को वो हमेशा के लिए छोड़ कर शिमला के इस छोटे से गाँव में आ गई थी. वो आज अपने ख़्वाबों को पूरा कर रही थी, उसने पीएचडी पूरी की और यहीं शिमला के एक कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी कर रही थी. इस ख्यालों में डूबी हुई वो वहां रात 2 बजे तक बैठी रही, उसके बाद कविता वहां से अपने बेड रूम में वापस आ गई और एक बार फिर से सोने का प्रयास करने लगी. उसे नींद नहीं आ रही थी, वो बेड पर लेट कर टेबल लैंप को जलती बुझाती रही.

ऐसा करते करते कब वो सो गई उसे याद नहीं. सुबह 8 बजे अलार्म वॉच बजी, वो अलार्म की आवाज़ सुनकर जाग गई. उसने अलार्म बंद की, वक़्त देखा और फिर उसे याद आया कि आज तो कॉलेज जाना हैं. सेकंड ईयर हिस्ट्री के स्टूडेंट्स का आज स्पेशल लैक्चर हैं. वो झट से उठी तैयार हुई, चाय और लाइट ब्रेकफास्ट बनाया और करीब 9:30 बजे वो फ़्लैट लॉक करके कॉलेज चली गई. शाम को जब वो घर आई तो देख मेल बॉक्स में एक लिफ़ाफा पड़ा था. वो लिफ़ाफा लेकर रूम में आ गई, उसे बेड पर रखकर सीधा किचन में चली गई. उसने तुरंत हॉट कॉफ़ी बनाई और 5 मिनट बाद उसे लेकर बेड रूम में आ गई. उसने लिफ़ाफे को गौर से देखा हर्ष ने भेजा था, वो एक पल के लिए शॉकड हो गई. उसने लिफ़ाफा खोला तो उसमें डिवोर्स पेपर थे, उसके चेहरे पर हल्की सी ख़ुशी चमक पड़ी ऐसा लग रहा था मानों अब उसे सच में आज़ादी मिल रही हो. साथ में थोड़ा सा गुस्सा भी थी क्योंकि वो उसे तीन साल बाद मिल रहे थे, बहुत देर कर दिया था हर्ष ने उसे डिवोर्स पेपर भेजने में. उसने देखा कि एक लेटर भी उसमें था. उसने उसे खोला और पढ़ने लगी. 

डियर कविता!

मुझे माफ़ कर दो! 

उस पूरे लेटर में ऐसा लग रहा था कि शायद इन बीते तीन सालों में हर्ष को अपने गलती का एहसास हो गया था और उसकी की वजह से उसने ये लेटर लिखा था. 

कविता ने सोचा तीन साल बहुत लम्बा वक़्त होता हैं, समय के साथ हर ज़ख़्म भर जाते हैं और फ़िनली आज हर्ष को भी अपनी गलती पर पछतावा तो हुआ. उसने डिवोर्स पेपर को संभल कर रख दिया और रेडियो चला कर सो गई. रेडियो बज रहे कटी पतंग फ़िल्म का गीत "मेरी ज़िंदगी हैं क्या एक कटी पतंग हैं" चलते चलते पूरे कमरे में फैल गया.