“दिल समंदर जैसा रखना साहब,
देखना नदियाँ खुद ही मिलने आयेगी।”
परिश्रम वह चाबी है
जो सौभाग्य के द्वार खोलती है
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए,
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए|
आकाश से ऊँचा कौन – पिता
धरती से बड़ा कौन – माता
चलो ज़िन्दगी को जिंदादिली से जीने के लिए एक छोटा सा उसूल बनाते हैं,
रोज़ कुछ अच्छा याद रखते हैं, और कुछ बुरा भूल जाते हैं।