ये मिलावटी रिश्तो का दौर है साहब..
यहाँ नफरतो से इल्जाम भी सादगी के लिबास में लगाए जाते है..
यकीन और दुआ नज़र नहीं आते मगर,
नामुमकिन को मुमकिन बना देते हैं।
इश्क का होना भी लाजमी है शायरी के लिये..कलम लिखती तो दफ्तर का बाबू भी ग़ालिब होता।
बहोत अंदर तक जला देती है,वो शिकायतें जो बयाँ नही होती..
ज़रूरी नहीं की हर समय, लबों में भगवन का नाम आये,
वो लमहा भी भक्ति का होता है, जब इंसान इंसान के काम आये।