दर्द, गम, डर जो भी है बस तेरे अंदर है
खुद के बनाये पिंजरे से बाहर निकल,तू
भी एक सिकंदर है
मुझको ढूंढ लेती है रोज़ एक नए बहाने से
तेरी याद वाक़िफ़ हो गयी है मेरे हर ठिकाने से
Na Pocho Ke Meri Manjil Kaha Hai
Abhi To Safar Ka Irada Kiya Hai
Na Haronga Hosla Umar Bhar
Ye Mene Kisi se nahi khud se vadha kiya hai…
खो गयी है मंजिले, मिट गए है सारे रस्ते,
सिर्फ गर्दिशे ही गर्दिशे, अब है मेरे वास्ते.
काश उसे चाहने का अरमान न होता,
मैं होश में रहते हुए अनजान न होता
न प्यार होता किसी पत्थर दिल से हमको,
या फिर कोई पत्थर दिल इंसान न होता.
Aansu na hote to aankh itni haseen na hoti,
Dard na hota to khushiyo kya hoti,
Puri karte khuda yuhi sab muraade,
To ibadat ki kabhi zarurat na hoti.