क्या बेचकर हम खरीदे
फुर्सत ऐ जिंदगी,
सब कुछ तो गिरवी पड़ा है
जिम्मेदारी के बाजार में..!!
“लोग क्या कहेंगे”- ये बात इंसान को आगे नहीं बढ़ने देती
बुराई को देखना और सुनना ही
बुराई की शुरुआत है
पापा को अपने आज क्या उपहार दू,
तोहफे दे फूलों के या गुलाबों का हार दू,
हमारी जिंदगी में जो है सबसे प्यारे,
उन पर तो अपनी जिंदगी ही वार दू।
संस्कारों से बड़ी कोई वसीयत नहीं होती
और ईमानदारी से बड़ी कोई विरासत नहीं होती