मिली थी जिन्दगी किसी के “काम” आने के लिए,
पर वक्त बीत रहा है क़ागज के टुकड़े कमाने के लिए…
मेरी बुराई ज़रा संभलकर करना...
तुम्हारे अपनों में कुछ मेरे भी शामिल हैं...!!
किसी को काँटों से चोट पहुंची
किसी को फूलों ने मार डाला
जो इस मुसीबत से बच गए थे
उन्हें उसूलों ने मार डाला
लौटकर आया हूँ फिर से मैदान मै?
अंदाज वही है सिर्फ तरीका बदल गया है!
जिस्म छू के तो सब गुज़रते हैं,रूह छूता है कोई हजारों में…
साँसों में तेरी खुशबु है, दिल में तू धड़कती है,
कैसे बताऊ तुझको मैं, तू कितना याद आती है।