चलो ये जुर्म भी कबूल है,
जो तेरी इजाज़त के बगैर तुझे अपना समझा.
उस राह पर मुझको जाना है…
जिस राह पर मुझको श्याम मिले…
कुछ मिले या ना मिले बस…
उनकी सेवा का मुझे काम मिले…
दरारें मत आने दीजिए,चाहे रिश्ता हो या दीवारें,बाहरी हवा अक्सर वहीं..अपना रास्ता बना लेती है।
"बैठे-बैठे एक मुस्कुराहट,ओंठो पे आ गई,कोई बात तुम्हारी प्यारी, जहन में आ गई,लोगो ने पूछा क्या है, क्यों हँस रहे हो,उन्हें क्या बताता, तुम कैसे पागल बना गई l"
याद आयेगी हमारी तो बीते कल को पलट लेना ..
यूँ ही किसी पन्ने में मुस्कुराते हुए मिल जायेंगे ..
तुमसे ही रूठ कर तुम्ही को याद करते हैं
हमे तो ठीक से नाराज़ होना भी नही आता