" हम ता-उम्र एक दूसरे जैसे नहीं है,ये कह के आपस में लड़ते रहे..कितना अच्छा होता,तुम मेरी कमी,मैं तुम्हारी कमी पूरा कर देता l "
मेरे यादों का रुख़ आज भी,तेरी गली में होता रहता है lवो कल भी बेखबर था,वो आज भी बेखबर है,वो बस चैन से सोता रहता है
आफत है तेरे खत के फाड़े हुये पुर्जे,रख्खे भी नहीं जाते फेंके भी नहीं जाते..
"बड़ी आरजू होती है किमिलकर तुमसे ये-वो कहेंगे,और हर बार उलझ जाते है,आँखों में और बात भूल जाते है l"
इतनी मिलती है मेरी ग़ज़लों से सूरत तेरीलोग तुझ को मेरा महबूब समझते होंगे l
और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया