अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए,
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए|
लफ्जों के बोझ से
थक जाती है जुबाँ
कभी कभी
पता खामोशी
"मज़बूरी" है या
"समझदारी"
शब्दों का भी
तापमान होता है,
ये सुकून भी देते है
और जला भी
देते है...
नींद तो बचपन में
आती थी,
अब तो बस थक कर
सो जाते है..!!