चुप-चाप से रहते हैं वो अक्सर,
ज़ुल्फ़ें भी सुना है कि संवारा नहीं करते,
दिन रात गुजरते हैं उनके बेचैन से,
तो चैन से हम भी गुजारा नहीं करते।
मेरे बारे में अपनी सोच को थोड़ा बदलकर देख,
मुझसे भी बुरे हैं लोग तू घर से निकलकर देख…!
इश्क का होना भी लाजमी है शायरी के लिये..कलम लिखती तो दफ्तर का बाबू भी ग़ालिब होता।
घुटन क्या चीज़ है, ये पूछिये उस बच्चे से
जो काम करता हैं ,इक खिलोने की दुकान पर...
Mohabbat Aur Maut Dono Ki
Pasand Bhi Ajeeb Hai:
Ek Ko Dil Chahiye:
Aur Dusre ko Dhadkan!