समय रहते तुम होश में कैफ़ियत तलब करते तो अच्छा होताअलविदा कहने से पहले ख़ैरियत सोचते तो अच्छा होता.
समय रहते तुम होश में कैफ़ियत तलब करते तो अच्छा होता
अलविदा कहने से पहले ख़ैरियत सोचते तो अच्छा होता.
उड़ने दे इन परिंदों को आज़ाद फिजां में ‘गालिब’जो तेरे अपने होंगे वो लौट आएँगे
हाथो की लकीरों पे मत जा ए ग़ालिब,नसीब उनके भी होते हैं जिनके हाथ नहीं होते|
न जाने क्या है किसी की उदास आँखों मैंवो मुंह छुपा के भी जाए तो बेवफ़ा न लगे
न जाने क्या है किसी की उदास आँखों मैं
वो मुंह छुपा के भी जाए तो बेवफ़ा न लगे
इश्क का होना भी लाजमी है शायरी के लिये..कलम लिखती तो दफ्तर का बाबू भी ग़ालिब होता।