*अपनी आंखों को* *जगा दिया हमने**सुबह का फर्ज अपना* *निभा दिया हमने**मत* *सोचना कि बस* *यूं ही तंग किया हमने**उठकर* *सुबह भगवान के साथ**आपको भी याद किया हमने**सुप्रभात*
मैं तेरे हिज़ार की बरसात में कब तक भीगू!!ऐसे मौसम में तो दीवारे भी गिर जाती है..
एक सपने के टूटकर चकनाचूर हो जाने के बाद..दूसरा सपना देखने के हौसले को 'ज़िंदगी' कहते हैं..
कुछ यूँ उतर गए हो मेरी रग-रग में तुम,कि खुद से पहले एहसास तुम्हारा होता है।
हमे बेवफा बोलने वाले
आज तू भी सुनले,
जिनकी फितरत ‘बेवफा’
होती है,
उनके साथ कब ‘वफा’ होती है!!