जब खामोश निगाहों से बात होती है,
तो ऐसे ही मोहब्बत की शुरुआत होती है,
हमतो बस खोये ही रहतें हैं उनके ख्यालों में,
पता ही नही चलता कब दिन कब रात होती है।
उसने महबूब ही तो बदला है फिर ताज्जुब कैसा ???
दुआ कबूल ना हो तो लोग खुदा तक बदल लेते है !!!
“अपनों को याद करना प्यार हैं,
गैरों का साथ देना संस्कार हैं,
दुश्मनो को माफ करना उपकार हैं,
और आप जैसे दोस्तों को परेसान करना जन्मसिद्ध अधिकार हैं.”
ये मेरा दिवानापन है,या मोहब्बात का सुरूर....!तू ना पहचाने तो है ये तेरी नाजरों का कुसूर....!!बसने लगी आँखों में कुछ ऐसे सपने...कोई बुलाये जैसे नैनों से अपने...!!!
बर्बाद कर दिया मुझे,
तेरी इन मस्त निगाहों ने,
सौ साल जी लेते,
अगर दीदार-ऐ-हुस्न तेरा ना किया होता…