माना की दूरियां कुछ बढ़ सी गयीं हैं लेकिन तेरे हिस्से का वक़्त आज भी तनहा गुजरता है.
मुझको ढूंढ लेती है रोज़ एक नए बहाने से तेरी याद वाक़िफ़ हो गयी है मेरे हर ठिकाने से
जिस जिसका मैं हुआ नहीं
उसकी जिंदगी सवर गयी
मैं राह देखता रहा जाने किसकी
और इन्ही राहों पे ये जिंदगी गुजर गयी
तेरी नज़रों से ओझल हो जायेंगे हम ,दूर फ़िज़ाओं में कहीं खो जायेंगे हम ,हमारी यादों से लिपट कर रोते रहोगे ,जब ज़मीन की मट्टी में सो जायेंगे हम..