मेरी मान डेंगू का कोर्स कर ले और दिल्ली निकल जा.. मलेरिया में कुछ नहीं रखा अब..जी पापा जी
ज़ुल्म इतना ना कर के लोग कहे तुझे दुश्मन मेरा…!!
हमने ज़माने को तुझे अपनी “ जान ” बता रक्खा है…!!
तूने रुख से नक़ाब क्या उठाया,
कम्बखत दिल मुँह को होने लगा,
शर्मा कर , सितारे हैं छुपने लगे,
महताब बादलों से जो निकलने लगा
सुबह प्राणायाम करने वाले जितनी भी हवा खींचते हैं,....उसे चिप्स बनाने वाली कंपनियां खरीदकर चिप्स के पैकेट में बंदकर बेच देती हैं!
न जाने क्या मासूमियत है तेरे चेहरे पर …..
तेरे सामने आने से ज़्यादा तुझे छुपकर
देखना अच्छा लगता है …!!!