कुछ तो था उसके होठो पर ना जाने हम से क्यों शरमाती थी, एक दिन हँसी तो पता चला नालायक तंबाखू खाती थी|
जाड़े की रुत है नई तन पर नीली शाल
तेरे साथ अच्छी लगी सर्दी अब के साल...
चाहता कौन है बेवफ़ायी करना
उसने परिवार सम्भाला होगा
यही सोच कर समझाता हूँ ख़ुदको
मजबूर होकर मुझे दिल से निकाला होगा
संता ने एयरटेल के ऑफिस में फोन किया
संता – मेरे फोन का बिल बहुत ज्यादा आया है
इतनी तो मैंने बात भी नहीं की है
बंता (एयरटेल से) – अच्छा आपका प्लान क्या है ?
संता – अभी तो मार्किट आया हुआ हूँ
शाम को दारू पिऊंगा…आप अपना बताइये
ग़म न कर ज़िन्दगी बहुत बड़ी है,
चाहत की महफ़िल तेरे लिए सजी है,
बस एक बार मुस्कुरा कर देख,
तक़दीर खुद तुझसे मिलने बाहर खुद खड़ी है…