पीता हूँ जितनी उतनी ही बढ़ती है तिश्नगी,साक़ी ने जैसे प्यास मिला दी हो शराब में।
सिखा न सकी जो उम्र भर तमाम किताबे मुझे..
करीब से कुछ चेहरे पढे और न जाने कितने..
सबक सीख लिए।
दिखा के मदभरी आंखें कहा ये साकी ने,
हराम कहते हैं जिसको यह वो शराब नहीं।
साकी देख ज़माने ने क्या इल्जाम लगाया हैंआंखें तेरी नशीली हैं और शराबी हमें बताया हैं
बैठा हूँ मयखाने में
गम मिटा रहा हूँ
मैं भी क्या अजीब हूँ
शिकायत ख़ुदा से है
मैं साकी को बता रहा हूँ
बात साक़ी की न टाली जाएगी
कर के तौबा तोड़ डाली जाएगी