जाने वो कैसे मुकद्दर की किताब लिख देता है,
सांसें गिनती की और ख्वाहिशें बेहिसाब लिख देता है!
ज़िन्दगी के सफ़र में मैंने अब तक तो यही जाना है,
ख्वाहिशों का हाथ अक्सर मजबूरियों ने थामा है!
"सफर में हूँ मंज़िल आँखों में ये,बसा
अभी अरमान मेरे अधूरे से है।"
"अगर अपने आप से ऊब जाए तो जरूर सफर पर निकल जाय,
हो सकता है की आपकी ज़िंदगी संवर जाए।"
सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
निदा फ़ाज़ली
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा.