यूँ लगे दोस्त तिरा मुझ से ख़फ़ा हो जाना,
जिस तरह फूल से ख़ुशबू का जुदा हो जाना!
ज़िन्दगी तेरी हसरतों से खफा कैसे हो
तुझे भूल जाने की खता कैसे हो,
रूह बनकर समा गए हो हम में
तो रूह फिर जिस्म से जुदा कैसे हो!
जब भी खफा होती हो मुझसे मान जाया करो जल्दी से
क्योकि मे तुमसे प्यार करता हू दिल से
अंदाज़ भी निराला है उनका
वो हो कर खफा मुझ से
मेरे गुमशुदगी की वजह पूछते हैं
हक़ हूँ में तेरा हक़ जताया कर,यूँ खफा होकर ना सताया कर. 210
यूँ खफा होकर ना सताया कर.
काश कोई मिले इस तरह के फिर जुद़ा ना हो,
वो समझे मेरे मिज़ाज़ को औऱ कभी खफ़ा ना हो !!