ऐ ग़म-ए-ज़िंदगी न हो नाराज़
मुझ को आदत है मुस्कुराने की
मुस्कुराने की आदत है ज़नाब,
हम उदासियों के मुँह नहीं लगते!
रातों को आवारगी की आदत तो हम दोनों में थी,
अफ़सोस चाँद को ग्रहण और मुझे इश्क हो गया!
यूं तो किसी चीज के मोहताज नहीं हम,
बस एक तेरी आदत सी हो गई।।