ये बैचनी जो मेरे घर आई है,ना जाने कौनसा दर्द साथ लाई है lक्यों नज़र को, नज़र की तालाश है,क्या ये काँटों से भरा गुलाब है,या दूर कुसुमित फूल पलाश है l
भरम रखो मोहब्बत का
वफ़ा की शान बन जाओ,
किसी पर जान देदो या
किसी की जान बन जाओ,
तुम्हारे नाम से मुझको
पुकारें ये जहाँ वाले
मैं बन जाऊं अफसाना
और तुम उन्वान बन जाओ।
प्यार हो जाता है, करता कौन हैं
हम तो कर देंगे प्यार में जान भी कुरबान,
लेकिन पता तो चले कि..
हम से प्यार करता कौन हैं..!
खिड़की से झांकता हूँ मै, सबसे नज़र बचा कर
बेचैन हो रहा हूँ, क्यों घर की छत पे आ कर
क्या ढूँढता हूँ, जाने क्या चीज खो गई है,
इन्सान हूँ, शायद मोहब्बत हमको भी हो गई।
मैं अगर चाहु भी तो शायद ना लिख सकूं उन लफ़्ज़ों को
जिन्हे पढ़ कर तुम समझ सको की मुझे तुम से कितनी मोहब्बत है..!!