अकेले ही लड़नी होती है जिन्दगी की लड़ाई
क्योकि लोग सिर्फ तसल्ली देते हैं साथ नही !
“ज़िंदगी” की “तपिश” को
“सहन” कीजिए “जनाब”,
अक्सर वे “पौधे” “मुरझा” जाते हैं,
जिनकी “परवरिश” “छाया” में होती हैं…
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए,
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए|
अच्छाई और बुराई दोनों हमारे अंदर हैं
जिसका अधिक प्रयोग करोगे वो उभरती व निखरती जायगी
“लोग क्या कहेंगे”- ये बात इंसान को आगे नहीं बढ़ने देती