आँखें जो खुली तो उन्हें अपने करीब पाया ना था

कभी थे रूह में शामिल आज उनका साया ना था

बेपनाह मोहब्बत की जिनसे उम्मीदें लिये बैठे थे

उनसे तन्हाइयों की सौगातें मिलेंगी बताया ना था

एक हम ही कसीदे हुस्न के हर बार पढ़ते रहे पर

उसने तो कभी हाल-ए-दिल सुनाया ना था

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Kitnaa khouf hota hai shaam ke andheroo mein,

Poonch un parindoo se jin ke ghar nahi hote.

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उसने मिलने की अजीब शर्त रखी… 
गालिब चल के आओ सूखे पत्तों पे लेकिन कोई आहट न हो!

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इश्क का होना भी लाजमी है शायरी के लिये..
कलम लिखती तो दफ्तर का बाबू भी ग़ालिब होता।

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रोज़ ये दिल बेकरार होता है,
काश के तुम समझ सकते की
चुप रहने वालो को भी किसी से प्यार होता है...

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Hum toh fanaah ho gaye uski ankhen dekh kar Ghalib,
Na jane woh Aaina kaise dekhte honge.

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Dard ho Dil Men To Dawa Kijiye
Dil hi Jab Dard Ho To Kya Kijiye.

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दुःख देकर सवाल करते हो,
तुम भी जानम कमाल करते हो,


देख कर पूछ लिया हाल मेरा,
चलो कुछ तो ख्याल करते हो,


शहर-ए दिल में ये उदासियाँ कैसी,
ये भी मुझसे सवाल करते हो,


मरना चाहें तो मर नहीं सकते,
तुम भी जीना मुहाल करते हो,


अब किस-किस की मिसाल दूँ तुम को,
हर सितम बे-मिसाल करते हो।
 -मिरजा गालि़ब साहब

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उड़ने दे इन परिंदों को आज़ाद फिजां में ‘गालिब’
जो तेरे अपने होंगे वो लौट आएँगे

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खैरात में मिली ख़ुशी मुझे अच्छी नहीं लगती ग़ालिब,
मैं अपने दुखों में रहता हु नवावो की तरह...

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