हाथो की लकीरों पे मत जा ए ग़ालिब,
नसीब उनके भी होते हैं जिनके हाथ नहीं होते|

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खैरात में मिली ख़ुशी मुझे अच्छी नहीं लगती ग़ालिब,
मैं अपने दुखों में रहता हु नवावो की तरह...

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उड़ने दे इन परिंदों को आज़ाद फिजां में ‘गालिब’
जो तेरे अपने होंगे वो लौट आएँगे

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तुम मुझे कभी दिल, कभी आँखों से पुकारो ग़ालिब,

ये होठो का तकलुफ्फ़ तो ज़माने के लिए है|

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रोज़ ये दिल बेकरार होता है,
काश के तुम समझ सकते की
चुप रहने वालो को भी किसी से प्यार होता है...

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इश्क का होना भी लाजमी है शायरी के लिये..
कलम लिखती तो दफ्तर का बाबू भी ग़ालिब होता।

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