उसने मिलने की अजीब शर्त रखी… 
गालिब चल के आओ सूखे पत्तों पे लेकिन कोई आहट न हो!

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इश्क का होना भी लाजमी है शायरी के लिये..
कलम लिखती तो दफ्तर का बाबू भी ग़ालिब होता।

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रोज़ ये दिल बेकरार होता है,
काश के तुम समझ सकते की
चुप रहने वालो को भी किसी से प्यार होता है...

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तुम मुझे कभी दिल, कभी आँखों से पुकारो ग़ालिब,

ये होठो का तकलुफ्फ़ तो ज़माने के लिए है|

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दुःख देकर सवाल करते हो,
तुम भी जानम कमाल करते हो,


देख कर पूछ लिया हाल मेरा,
चलो कुछ तो ख्याल करते हो,


शहर-ए दिल में ये उदासियाँ कैसी,
ये भी मुझसे सवाल करते हो,


मरना चाहें तो मर नहीं सकते,
तुम भी जीना मुहाल करते हो,


अब किस-किस की मिसाल दूँ तुम को,
हर सितम बे-मिसाल करते हो।
 -मिरजा गालि़ब साहब

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उड़ने दे इन परिंदों को आज़ाद फिजां में ‘गालिब’
जो तेरे अपने होंगे वो लौट आएँगे

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खैरात में मिली ख़ुशी मुझे अच्छी नहीं लगती ग़ालिब,
मैं अपने दुखों में रहता हु नवावो की तरह...

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हाथो की लकीरों पे मत जा ए ग़ालिब,
नसीब उनके भी होते हैं जिनके हाथ नहीं होते|

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